अनाज के साइलो से कॉर्पोरेट साम्राज्य तक : क्या भारत की खाद्य सुरक्षा दो कंपनियों के हाथों में सिमट रही है?

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भारत में जब भी कृषि की बात होती है, तो चर्चा अक्सर खेत, किसान, MSP और मंडियों तक सीमित रह जाती है। लेकिन कृषि व्यवस्था का एक और महत्वपूर्ण पक्ष है—भंडारण। खेत में पैदा हुआ अनाज यदि सुरक्षित नहीं रखा जा सके, तो उत्पादन का कोई अर्थ नहीं रह जाता। इसी कारण भारतीय खाद्य निगम (FCI) दशकों से देश की खाद्य सुरक्षा व्यवस्था की रीढ़ माना जाता रहा है।

पिछले कुछ वर्षों में केंद्र सरकार ने आधुनिक साइलो आधारित भंडारण प्रणाली को बढ़ावा देने का निर्णय लिया। इसे खाद्य प्रबंधन में सुधार, अनाज की बर्बादी कम करने और आधुनिक लॉजिस्टिक्स विकसित करने की दिशा में एक बड़ा कदम बताया गया। लेकिन अब इसी परियोजना को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। सवाल यह नहीं है कि साइलो बनने चाहिए या नहीं। सवाल यह है कि इन साइलो का नियंत्रण किसके हाथों में जा रहा है।

29 मई 2026 को प्रकाशित एक खोजी रिपोर्ट में समाचार पोर्टल न्यूज़लॉन्ड्री ने दावा किया कि लगभग 20,000 करोड़ रुपये के FCI साइलो कार्यक्रम के 134 अनुबंधों में से 110 अनुबंध केवल दो कंपनियों — अदानी एग्री लॉजिस्टिक्स और लीप इंडिया फूड एंड लॉजिस्टिक्स — को मिले। रिपोर्ट के अनुसार कुल 60 लाख मीट्रिक टन क्षमता में से लगभग 46.5 लाख मीट्रिक टन क्षमता इन्हीं दोनों कंपनियों के नियंत्रण में चली गई।

यह आरोप इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि रिपोर्ट के अनुसार FCI ने प्रारंभिक स्तर पर एक “एंटी-मोनॉपली” प्रावधान प्रस्तावित किया था, जिसका उद्देश्य किसी एक कंपनी को अत्यधिक हिस्सेदारी मिलने से रोकना था। लेकिन 2022 में हुई एक महत्वपूर्ण बैठक में नीति आयोग और आर्थिक मामलों के विभाग ने इस प्रावधान का विरोध किया और अंततः इसे हटा दिया गया।

यहीं से बहस शुरू होती है।

सरकार का तर्क है कि आधुनिक साइलो प्रणाली भारत की खाद्य सुरक्षा को मजबूत करेगी। प्रेस सूचना ब्यूरो (PIB) द्वारा जारी जानकारी के अनुसार साइलो परियोजनाओं से अनाज का संरक्षण बेहतर होगा, भंडारण हानि कम होगी, गुणवत्ता नियंत्रण मजबूत होगा और रेल-रोड आधारित लॉजिस्टिक्स अधिक कुशल बनेंगे।

यह तर्क तकनीकी रूप से सही है। भारत में लंबे समय से अनाज खुले गोदामों और अस्थायी संरचनाओं में रखा जाता रहा है। नियंत्रित तापमान और वैज्ञानिक भंडारण वाली साइलो प्रणाली आधुनिक समाधान मानी जाती है। लेकिन समस्या तकनीक से नहीं, नियंत्रण से जुड़ी हुई है।

लोकतांत्रिक अर्थव्यवस्थाओं में एक सिद्धांत बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है—रणनीतिक क्षेत्रों में शक्ति का अत्यधिक केंद्रीकरण नहीं होना चाहिए। खाद्य सुरक्षा ऐसा ही एक रणनीतिक क्षेत्र है। भारत की सार्वजनिक वितरण प्रणाली दुनिया की सबसे बड़ी खाद्य सुरक्षा योजनाओं में से एक है। करोड़ों गरीब परिवार इसी व्यवस्था पर निर्भर हैं।

यदि अनाज का भंडारण, हैंडलिंग और लॉजिस्टिक्स धीरे-धीरे कुछ चुनिंदा निजी कंपनियों के नियंत्रण में केंद्रित हो जाए, तो यह केवल व्यावसायिक प्रश्न नहीं रह जाता। यह सार्वजनिक नीति का प्रश्न बन जाता है।

याद कीजिए 2020-21 का किसान आंदोलन। उस समय तीन कृषि कानूनों के खिलाफ किसानों ने जो सबसे बड़ी आशंका व्यक्त की थी, वह थी कृषि क्षेत्र में कॉर्पोरेट प्रभाव का बढ़ना। किसानों का एक वर्ग मानता था कि मंडी व्यवस्था को कमजोर कर निजी कंपनियों को अधिक शक्ति दी जा रही है। सरकार ने इन आशंकाओं को खारिज किया था, लेकिन आज साइलो परियोजना को लेकर उठ रहे सवाल उसी बहस को फिर जीवित कर रहे हैं।

2024 में पंजाब में तब विवाद खड़ा हो गया जब निजी साइलो परिसरों को खरीद केंद्र के रूप में उपयोग करने की कोशिश की गई। किसान संगठनों ने इसका विरोध किया और आशंका जताई कि इससे पारंपरिक मंडी व्यवस्था कमजोर हो सकती है। विरोध बढ़ने के बाद निर्णय वापस लेना पड़ा। यह घटना बताती है कि किसानों के बीच साइलो केवल एक भंडारण तकनीक नहीं, बल्कि कृषि बाजार की दिशा का प्रतीक बन चुका है।

सरकार और समर्थक अर्थशास्त्री यह कहते हैं कि यदि किसी कंपनी ने खुली निविदा प्रक्रिया में अनुबंध जीते हैं तो उसे गलत नहीं कहा जा सकता। FCI ने भी हाल ही में जारी अपने स्पष्टीकरण में कहा है कि निविदा प्रक्रिया पारदर्शी और प्रतिस्पर्धी थी तथा किसी प्रकार का पक्षपात नहीं किया गया। FCI का कहना है कि यह क्षेत्र अभी विकासशील अवस्था में है और भागीदारी पर कृत्रिम प्रतिबंध लगाने से निवेश और प्रतिस्पर्धा प्रभावित हो सकती थी।

यह तर्क भी विचारणीय है। लेकिन आलोचकों का प्रश्न यह है कि यदि वास्तव में प्रतिस्पर्धा इतनी मजबूत थी, तो फिर अधिकांश अनुबंध केवल दो कंपनियों तक सीमित क्यों रह गए?

यहां “मोनॉपली” और “डुओपॉली” की अवधारणा समझना आवश्यक है। मोनॉपली का अर्थ है एक कंपनी का प्रभुत्व। जबकि डुओपॉली का अर्थ है दो कंपनियों का ऐसा प्रभुत्व जिसमें बाकी खिलाड़ी नगण्य हो जाएं। यदि किसी राष्ट्रीय कार्यक्रम की 75 प्रतिशत से अधिक क्षमता दो कंपनियों के पास चली जाए, तो यह कम से कम बाजार के अत्यधिक केंद्रीकरण का संकेत अवश्य माना जाएगा।

एक और महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि राष्ट्रीय मुद्रीकरण पाइपलाइन (National Monetisation Pipeline) के अंतर्गत भी गोदामों और साइलो परिसंपत्तियों को निजी भागीदारी के लिए खोले जाने की नीति अपनाई गई थी। उस समय भी विशेषज्ञों ने चेतावनी दी थी कि खाद्य अवसंरचना के निजीकरण में संतुलन और नियामक निगरानी आवश्यक होगी।

दिलचस्प बात यह है कि विश्व बैंक समूह की संस्था IFC द्वारा लीप इंडिया के संबंध में जारी दस्तावेजों में भी कंपनी को भारत के आधुनिक कृषि भंडारण क्षेत्र का प्रमुख खिलाड़ी बताया गया है तथा उसके राष्ट्रीय साइलो नेटवर्क के विस्तार का उल्लेख किया गया है।

इस पूरी बहस में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह नहीं है कि अदानी या लीप इंडिया अच्छी कंपनियां हैं या बुरी। प्रश्न यह है कि क्या भारत की खाद्य सुरक्षा व्यवस्था को किसी भी परिस्थिति में कुछ निजी संस्थाओं पर अत्यधिक निर्भर होना चाहिए?

इतिहास बताता है कि जब भी किसी क्षेत्र में अत्यधिक केंद्रीकरण हुआ है, तब प्रतिस्पर्धा कमजोर हुई है। चाहे वह दूरसंचार क्षेत्र हो, ऊर्जा क्षेत्र हो या डिजिटल प्लेटफॉर्म का क्षेत्र। लोकतांत्रिक अर्थव्यवस्था का उद्देश्य केवल निवेश आकर्षित करना नहीं होता, बल्कि शक्ति का संतुलन बनाए रखना भी होता है।

यदि भविष्य में भंडारण शुल्क, लॉजिस्टिक्स सेवाएं और खरीद संबंधी प्रक्रियाएं कुछ चुनिंदा कंपनियों के प्रभाव में आने लगती हैं, तो सरकार की सौदेबाजी क्षमता भी प्रभावित हो सकती है। इसलिए आज जो प्रश्न किसान संगठन उठा रहे हैं, उन्हें केवल राजनीतिक आरोप कहकर खारिज नहीं किया जा सकता।

साइलो तकनीक भारत के लिए आवश्यक है। आधुनिक भंडारण की जरूरत पर शायद ही कोई विवाद हो। लेकिन आधुनिकीकरण और निजी केंद्रीकरण एक ही चीज नहीं हैं। भारत को साइलो चाहिए, लेकिन भारत को प्रतिस्पर्धा भी चाहिए। भारत को निजी निवेश चाहिए, लेकिन सार्वजनिक जवाबदेही भी चाहिए। भारत को दक्षता चाहिए, लेकिन खाद्य सुरक्षा पर लोकतांत्रिक नियंत्रण भी चाहिए।

आज जब देश की खाद्य सुरक्षा व्यवस्था के एक बड़े हिस्से का भविष्य तय किया जा रहा है, तब यह बहस केवल अनाज भंडारण की नहीं रह जाती। यह प्रश्न भारत की आर्थिक नीति, लोकतांत्रिक जवाबदेही और कृषि के भविष्य का प्रश्न बन जाता है।

क्योंकि अंततः सवाल साइलो का नहीं है।

सवाल यह है कि भारत का अन्न किसके नियंत्रण में होगा।

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