सुप्रीम कोर्ट ने अनिवार्य मतदान याचिका खारिज की; CJI ने जागरूकता पर जोर दिया

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भारत · न्यायपालिका · चुनाव

**भारत के मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि लोकतंत्र कानूनी दबाव से नहीं, बल्कि जन जागरूकता से फलता-फूलता है। सुप्रीम कोर्ट ने मतदान को अनिवार्य करने की मांग वाली याचिका को सुनने से इनकार कर दिया।**
75भारत ने लोकतांत्रिक प्रक्रिया में प्रदर्शित किए गए वर्ष
3मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की बेंच में न्यायाधीश
1याचिकाकर्ता अजय गोयल द्वारा प्रस्तुत PIL याचिका

भारत के सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को देश में मतदान को अनिवार्य करने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई से इनकार कर दिया। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायाधीश जॉयमाल्या बागची और न्यायाधीश विपुल एम पंचोली की तीन सदस्यीय बेंच ने कहा कि यह मुद्दा नीतिगत दायरे में आता है और न्यायपालिका इस पर आदेश जारी नहीं कर सकती।

अनिवार्य मतदान पर कोर्ट की स्थिति

बेंच ने कहा कि जान-बूझकर वोट न डालने वालों के लिए दंडात्मक कार्रवाई की मांग और अनिवार्य मतदान की याचिकाएं न्यायालय के अधिकार क्षेत्र से बाहर हैं। याचिकाकर्ता अजय गोयल ने न केवल अनिवार्य मतदान की मांग की थी, बल्कि गैर-मतदाताओं के लिए सरकारी सुविधाओं पर प्रतिबंध लगाने के लिए दिशा-निर्देश जारी करने की भी मांग की थी।

मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि लोकतंत्र कानूनी दबाव के बजाय जन जागरूकता से फलता-फूलता है। वह बोले, "एक ऐसे देश में जो कानून के शासन से चलता है और लोकतंत्र में विश्वास रखता है, जहां हमने 75 सालों में दिखाया है कि हम इस पर कितना भरोसा करते हैं, वहां हर किसी से यह उम्मीद की जाती है कि वह वोट डालने जाए।"

“जरूरत जागरूकता की है, लेकिन हम किसी को मजबूर नहीं कर सकते।”

— मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत

अनिवार्य मतदान की व्यावहारिक कठिनाइयां

सुनवाई के दौरान बेंच ने अनिवार्य मतदान कानून की व्यावहारिक समस्याओं पर ध्यान दिया। बेंच ने नोट किया कि चुनाव के दिनों में न्यायाधीशों समेत कई नागरिकों को अपने काम के कारण अपने निर्वाचन क्षेत्र नहीं जा सकते। मुख्य न्यायाधीश ने एक उदाहरण देते हुए कहा कि यदि अनिवार्य मतदान लागू किया गया तो न्यायाधीश बागची को पश्चिम बंगाल जाने के लिए मजबूर किया जा सकता है, भले ही वह दिन कार्य दिवस हो।

बेंच ने समाज के आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के बारे में भी चिंता व्यक्त की। बेंच ने पूछा, "अगर कोई गरीब व्यक्ति कहता है कि मुझे अपनी दिहाड़ी कमानी है, तो मैं वोट कैसे डालूं, हम उनसे क्या कहेंगे?"

KEY FACTS
• सुप्रीम कोर्ट ने अनिवार्य मतदान की याचिका को नीतिगत मुद्दा बताते हुए खारिज किया
• मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि लोकतंत्र कानूनी दबाव नहीं, जागरूकता से फलता है
• याचिकाकर्ता ने गैर-मतदाताओं के लिए सरकारी सुविधाओं पर प्रतिबंध की मांग की थी
• बेंच ने नोट किया कि अनिवार्य मतदान गरीब और व्यस्त व्यक्तियों को प्रभावित करेगा
• भारत ने 75 वर्षों में लोकतांत्रिक प्रक्रिया को बनाए रखा है

न्यायालय द्वारा अनिवार्य मतदान को खारिज करना

मुख्य न्यायाधीश ने स्पष्ट किया कि घर पर रहने को अपराध बनाने का सुझाव समस्याग्रस्त है। उन्होंने कहा कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता और नागरिकों के अधिकारों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। बेंच ने याचिकाकर्ता से कहा कि वह अपनी शिकायतों को संबंधित पक्षों के साथ लें।

याचिकाकर्ता ने चुनाव आयोग को एक समिति बनाने का निर्देश देने का सुझाव दिया था, जो उन लोगों पर प्रतिबंध लगाने का प्रस्ताव दे सकती है जो मतदान करने में असफल रहते हैं। हालांकि, मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि ये मुद्दे नीतिगत दायरे में आते हैं और न्यायपालिका इस पर हस्तक्षेप नहीं कर सकती।

Analysisसुप्रीम कोर्ट का निर्णय न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच शक्तियों के विभाजन पर प्रकाश डालता है। मुख्य न्यायाधीश की टिप्पणी यह दर्शाती है कि भारत में लोकतांत्रिक मूल्यों को कानूनी दबाव के बजाय जन भागीदारी से बेहतर तरीके से बनाया जा सकता है। निर्णय राजनीति और प्रशासन संबंधी मुद्दों में न्यायिक हस्तक्षेप की सीमाओं को भी परिभाषित करता है।

भारत में मतदान की भागीदारी कई कारकों पर निर्भर करती है, जिसमें जागरूकता, सुविधा और सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियां शामिल हैं। सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद, मतदान दर बढ़ाने के लिए जन जागरूकता अभियानों पर ध्यान केंद्रित करने की जिम्मेदारी अब अन्य संस्थानों पर है।

📌 English Version

INDIA · JUDICIARY · ELECTIONS

**India's Chief Justice has stated that democracy thrives on public awareness rather than legal compulsion. The Supreme Court rejected a petition demanding mandatory voting across the country.**
75Years India has demonstrated democratic practice
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