
Bloomberg और Reuters की रिपोर्ट से सामने आई नई तस्वीर
रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद वैश्विक ऊर्जा बाजार में बड़ा बदलाव देखने को मिला। पश्चिमी देशों द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों के कारण रूस को अपने कच्चे तेल के लिए नए खरीदारों की तलाश करनी पड़ी। इसी दौर में भारत रूस का सबसे बड़ा तेल खरीदार बनकर उभरा। रूसी तेल कंपनियों ने भारतीय रिफाइनरियों को आकर्षित करने के लिए अपने प्रमुख Urals crude पर भारी छूट देना शुरू किया।
हालांकि अब अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्टों के अनुसार यह स्थिति बदल रही है। Bloomberg और Reuters की हालिया रिपोर्टों में कहा गया है कि रूस द्वारा भारत को दिए जाने वाले बड़े डिस्काउंट में तेजी से कमी आई है और कुछ मामलों में कीमतें वैश्विक स्तर के करीब पहुंच गई हैं।
पहले कितना मिलता था डिस्काउंट
2022 और 2023 के दौरान भारत को रूस से मिलने वाला तेल अंतरराष्ट्रीय बेंचमार्क Brent crude से लगभग 10 से 15 डॉलर प्रति बैरल सस्ता मिलता था। यही कारण था कि भारत ने रूस से तेल आयात तेजी से बढ़ाया और रूस भारत का प्रमुख आपूर्तिकर्ता बन गया।
अब कीमतों में क्या बदलाव आया
Bloomberg की रिपोर्ट के अनुसार हाल के महीनों में कुछ रूसी तेल कार्गो भारतीय रिफाइनरियों को Brent के बराबर या 2 से 4 डॉलर प्रति बैरल प्रीमियम पर भी बेचे गए। इसका मतलब है कि पहले जो भारी छूट मिलती थी, वह अब काफी कम हो चुकी है।
Reuters की रिपोर्ट भी इसी बदलाव की पुष्टि करती है। रिपोर्ट में कहा गया है कि वैश्विक बाजार में मांग बढ़ने और सप्लाई से जुड़े जोखिमों के कारण रूस अब अपने तेल को पहले जैसी रियायती कीमत पर बेचने की स्थिति में नहीं है।
इसके पीछे क्या कारण हैं
विशेषज्ञों के अनुसार इस बदलाव के पीछे कई कारण हैं।
- पहला कारण वैश्विक बाजार में तेल की मांग का बढ़ना है। एशिया और अन्य क्षेत्रों में ऊर्जा की मांग बढ़ने से रूसी तेल की खरीद भी बढ़ी है।
- दूसरा कारण मध्य-पूर्व में बढ़ते तनाव और समुद्री मार्गों में अनिश्चितता है। इससे कई देशों ने वैकल्पिक सप्लाई के रूप में रूसी तेल की तरफ रुख किया है।
- तीसरा कारण रूस की नई व्यावसायिक रणनीति मानी जा रही है। शुरुआती दौर में बाजार बनाए रखने के लिए रूस ने भारी छूट दी थी, लेकिन अब वह धीरे-धीरे कीमतों को वैश्विक स्तर के करीब ला रहा है।
भारत पर क्या असर पड़ सकता है
भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक देश है और उसकी ऊर्जा सुरक्षा काफी हद तक आयात पर निर्भर करती है। पिछले दो वर्षों में भारत की कुल तेल आयात में रूसी तेल की हिस्सेदारी काफी बढ़ गई थी।
अगर रूसी तेल पर मिलने वाली छूट कम होती है तो भारत के लिए आयात लागत बढ़ सकती है। ऐसी स्थिति में भारत को मध्य-पूर्व, अफ्रीका या अन्य क्षेत्रों से तेल आयात बढ़ाने पर भी विचार करना पड़ सकता है।
आगे क्या हो सकता है
ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि रूस और भारत के बीच तेल व्यापार जारी रहेगा क्योंकि दोनों देशों के बीच ऊर्जा सहयोग मजबूत है। हालांकि भविष्य में यह व्यापार पूरी तरह व्यावसायिक कीमतों पर आधारित हो सकता है और पहले जैसी भारी छूट शायद ही देखने को मिले।
निष्कर्ष
Bloomberg और Reuters की रिपोर्टों से संकेत मिलता है कि रूस द्वारा भारत को दिए जाने वाले तेल डिस्काउंट का दौर धीरे-धीरे खत्म हो रहा है। बदलते वैश्विक हालात और बढ़ती मांग के बीच रूस अब अपने तेल को अंतरराष्ट्रीय कीमतों के करीब बेचने की रणनीति अपना रहा है।
इस बदलाव का असर आने वाले समय में भारत की ऊर्जा नीति और वैश्विक तेल बाजार दोनों पर पड़ सकता है।






















