
मध्य पूर्व में जारी ईरान, अमेरिका और इज़राइल के बीच तनाव अब एक नए और गंभीर मोड़ पर पहुंच गया है। हाल ही में बहरीन ने दावा किया है कि ईरान के ड्रोन हमले से उसके एक डिसेलिनेशन प्लांट को नुकसान पहुंचा है। यह पहली बार है जब इस युद्ध के दौरान खाड़ी क्षेत्र में किसी जल संयंत्र को निशाना बनाए जाने की खबर सामने आई है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर ऐसे हमले बढ़ते हैं तो पूरे खाड़ी क्षेत्र में पानी की सुरक्षा (Water Security) पर गंभीर संकट खड़ा हो सकता है।
रिपोर्ट के अनुसार, बहरीन के जिस डिसेलिनेशन प्लांट को नुकसान पहुंचा है, उसके कारण लगभग 30 गांवों की पानी आपूर्ति प्रभावित हुई है। इससे यह चिंता और बढ़ गई है कि युद्ध के विस्तार के साथ अब ऊर्जा और तेल के ठिकानों के साथ-साथ नागरिक बुनियादी ढांचे को भी निशाना बनाया जा सकता है।
क्या होते हैं डिसेलिनेशन प्लांट?
डिसेलिनेशन प्लांट ऐसे संयंत्र होते हैं जो समुद्र के खारे पानी को साफ करके पीने योग्य मीठे पानी में बदलते हैं। इस प्रक्रिया में नमक, शैवाल और अन्य अशुद्धियों को हटाया जाता है। आम तौर पर यह काम दो तकनीकों से किया जाता है — थर्मल प्रक्रिया और मेम्ब्रेन आधारित तकनीक। खाड़ी देशों में सबसे अधिक इस्तेमाल होने वाली तकनीक रिवर्स ऑस्मोसिस है, जो ऊर्जा की दृष्टि से अपेक्षाकृत अधिक प्रभावी मानी जाती है।
खाड़ी देशों के लिए क्यों जरूरी हैं ये संयंत्र?
खाड़ी क्षेत्र दुनिया के सबसे जल-कमी वाले क्षेत्रों में गिना जाता है। यहां बारिश बहुत कम होती है और प्राकृतिक मीठे पानी के स्रोत सीमित हैं। इसी कारण इस क्षेत्र के देश अपनी पानी की जरूरतों का बड़ा हिस्सा समुद्र के पानी को साफ करके पूरा करते हैं।
एक अनुमान के अनुसार खाड़ी क्षेत्र में 400 से अधिक डिसेलिनेशन प्लांट मौजूद हैं। वैश्विक स्तर पर कुल डिसेलिनेशन क्षमता का लगभग 60 प्रतिशत हिस्सा GCC देशों के पास है और दुनिया के कुल डिसेलिनेटेड पानी का लगभग 40 प्रतिशत यहीं से उत्पन्न होता है।
कुछ देशों में पीने के पानी की निर्भरता इस प्रकार है:
कुवैत: लगभग 90 प्रतिशत
ओमान: लगभग 86 प्रतिशत
सऊदी अरब: लगभग 70 प्रतिशत
यूएई: लगभग 42 प्रतिशत
सऊदी अरब दुनिया में सबसे ज्यादा डिसेलिनेटेड पानी उत्पादन करने वाला देश है।
हमले का संभावित प्रभाव
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इन संयंत्रों पर हमले बढ़ते हैं तो इसका असर केवल पानी की आपूर्ति तक सीमित नहीं रहेगा। इससे आर्थिक गतिविधियों, उद्योग, कृषि और रोजमर्रा की जिंदगी पर भी गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।
इतिहास भी इस खतरे की ओर इशारा करता है। 1990-91 के खाड़ी युद्ध के दौरान इराकी सेना ने कुवैत की अधिकांश डिसेलिनेशन क्षमता को नष्ट कर दिया था, जिससे वहां पानी का गंभीर संकट पैदा हो गया था।
विशेषज्ञों का कहना है कि पानी जीवन के लिए सबसे जरूरी संसाधन है, इसलिए ऐसे हमलों का मनोवैज्ञानिक प्रभाव भी बहुत बड़ा होता है। लोगों में डर और असुरक्षा की भावना तेजी से फैल सकती है।
किन देशों को ज्यादा खतरा?
विश्लेषकों के अनुसार छोटे खाड़ी देश जैसे बहरीन, कतर और कुवैत सबसे ज्यादा जोखिम में हैं, क्योंकि ये देश लगभग पूरी तरह डिसेलिनेशन पर निर्भर हैं और इनके पास बड़े जल भंडार भी सीमित हैं।
हालांकि यूएई और सऊदी अरब ने कुछ हद तक आपात योजनाएं बनाई हैं। यूएई के पास कई शहरों के लिए लगभग 45 दिनों तक पानी की आपूर्ति करने लायक भंडारण क्षमता मौजूद है।
समाधान क्या हो सकता है?
विशेषज्ञों का सुझाव है कि खाड़ी देशों को पानी की सुरक्षा को केवल राष्ट्रीय मुद्दा न मानकर क्षेत्रीय स्तर पर मिलकर समाधान तलाशना चाहिए। इसके लिए साझा जल भंडार, एकीकृत डिसेलिनेशन नेटवर्क और नवीकरणीय ऊर्जा से चलने वाले छोटे-छोटे जल संयंत्र विकसित करने जैसे कदम उठाए जा सकते हैं।
हालांकि फिलहाल विशेषज्ञ मानते हैं कि निकट भविष्य में डिसेलिनेशन का कोई बड़ा विकल्प उपलब्ध नहीं है। इसलिए यदि युद्ध का दायरा बढ़ता है और जल संयंत्रों को निशाना बनाया जाता है, तो यह पूरे खाड़ी क्षेत्र की स्थिरता और मानव जीवन के लिए गंभीर चुनौती बन सकता है






















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